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Tuesday, 21 November 2017

Life cycle of star in hindi - तारे के जीवन का अंतिम चरण ( star live )

Life Cycle of a Star in hindi || The Universe Hindi

तारे के जीवन का अंतिम चरण ( Final Stages of a star,s Life )
अपने जीवन के अंतिम चरण के पहले भाग में तारा लाल (रक्त) दानव प्रवस्था (Red giant phase )में प्रवेश करता है , इसके बाद उसका भविष्य उसके प्रारंभिक द्रव्यमान पर निर्भर करता है | यहाँ दो स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं :
  1. यदि तारे का प्रारंभिक द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तुल्य होता है तो रक्त दानव अपने प्रसारित बाहर के आवरण को खो देता है और उसका क्रोड सिकुड़ करके स्वेत वामन तारा ( White dwarf star )बनता है | जो अंत में अंतरिक्ष में पदार्थ के सघन पिंड के रूप में नष्ट हो जाता है | 
  2. यदि तारे का प्रारंभिक द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से काफी अधिक होता है , तो उससे बना रक्त दानव तारा , अधिनव तारे (SuperNova) के रूप में विस्फोट होता है और इस विस्फोट से तारे का क्रोड संकुचित होकर न्यूट्रॉन तारा (Neutron star) अथवा कृष्ण छिद्र (Black Hole) बन जाता है | 

रक्त दानव प्रावस्था (Red - Gaint Phase)

आरम्भ में तारे में मुख्यतः हाइड्रोजन गैस होती है | समय बीतने के साथ हाइड्रोजन केंद्र से बाहर की और हीलियम में परिवर्तित हो जाती है | अब जब तारे का क्रोड में उपस्थित सम्पूर्ण हाइड्रोजन(H), हीलियम(He) परिवर्तित हो जाएगी तो क्रोड़ में संलयन अभिक्रिया बंद हो जायेगी | संलयन अभिक्रियाओं के बंद हो जाने के कारण तारे के क्रोड़ के भीतर दाब कम हो जाएगी और क्रोड़ अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण वह संकुचित होने लगेगा | लेकिन तारे के बाहरी आवरण में थोड़ी भोत हाइड्रोजन (H) बची रहती है जो संलयन अभिक्रिया कर ऊर्जा विमुक्त करती रहेगी परन्तु इसकी तीब्रता बहोत कम हो जाती है | इन सभी परिवतनों के कारण तारे में समग्र संतुलन गड़बड़ हो जाता है और उन्हें पुनः व्यवस्थित करने के उद्देश्य से तारे को उसके बाहरी क्षेत्र में प्रसार करना पड़ता है , जबकि गुरुत्वाकर्षण बलों के प्रभाव के कारण उसके क्रोड़ में संकुचन होता है | अतः समान्य तारे से रक्त दानव तारे में तारे का क्रोड़ सिकुड़ता है जबकि बाहरी आवरण में अत्यधिक प्रसार होता है | यह रक्त दानव कहलाता है | यह रक्त दानव कहलाता है क्योंकि यह रंग में लाल और आकार में विशाल दानवकार होता है | हमारा अपना तारा अब से लगभग 5000 मिलियन वर्षों के बाद रक्त - दानव तारे में बदल जायेगा | सूर्य का प्रसारित बाहरी आवरण तब इतना बड़ा हो जायेगा की यह अपने ग्रह - बुध , शुक्र , पृथ्वी  आदि को भी निगल जायेगा | तारा रक्त - दानव प्रावस्था में थोड़े समय ही रहता है क्योंकि इस अवस्था में यह अस्थाई रहता है | 

श्वेत वामन तारे का निर्माण ( Formation of white dwarf star)

जैसा की ऊपर बताया गया है की जब रक्त - दानव प्रावस्था में पहुँचता है , तो उसका भविष्य उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है | जब रक्त दानव तारा का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तुल्य होगा तो वह अपना प्रसारित बाहरी आवरण खो देगा केवल उसका क्रोड ही बचा रहेगा | यह हीलियम क्रोड गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे - धीरे द्रव्य के अत्याधिक सघन पिंड में संकुचित होगा | हीलियम क्रोड के इस अत्याधिक संकुचन के कारण क्रोड़ का ताप अत्यधिक बढ़ जाता है और नाभिकीय संलयन अभिक्रियाओ का एक अन्य सेट प्रारम्भ हो जाता है | जिसमें हीलियम भारी तत्वों जैसे कार्बन में परिवर्तित हो जाती है और ऊर्जा की अत्याधिक विशाल मात्रा विमुक्त होगी | इस प्रकार के क्रोड़ में सम्पूर्ण हीलियम थोड़े समय में कार्बन में परिवर्तित हो जाएगी और तब पुनः संलयन  अभिक्रिया पूर्णतः रुक जाएगी | अब जैसे ही तारे के अंदर उत्त्पन्न हो रही ऊर्जा बंद हो जाएगी तारे का क्रोड़ उसके भार के कारण सिकुड़ने लगेगा और वह स्वेत वामन तारा (white dwarf star) बन जायेगा |
स्वेत वामन तारा एक मृग तारा है क्योंकि यह संलयन प्रक्रिया द्वारा कोई नविन ऊर्जा उतपन्न नहीं करता है | स्वेत वामन तारा जब अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा खो देता है तो वह चमकना बंद कर देता है | इसके बाद स्वेत वामन तारा कृष्ण वामन ( white dwarf ) हो जाता है और अंतरिक्ष में पदार्थ के सघन पिंड के रूप में विलीन हो जाता है |

अधिनव तारे तथा न्युट्रान तारे का निर्माण (Formation of Supernova Star and Neutron Star)

यदि किसी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से बहुत अधिक हो तो रक्त दानव प्रावस्था के क्रम में इसके हीलियम क्रोड़ के संकुचन से विमुक्त नाभिकीय ऊर्जा बाहरी आवरण में तेज दमक के साथ विस्फोट उत्पन्न कर देती है | यह विस्फोट आकाश को कई दिनों तक प्रकाशित करता है | ऐसा विस्फोट तारा अधिनव (Supernova) तारा कहलाता है | सुपरनोवा विस्फोट के बाद भी इसके क्रोड़  संकुचन होता रहता है और न्युट्रान तारा बन जाता है | हमारी मन्दाकिनी दुग्धमेखला में न्युट्रान तारों की संख्या का अनुमान लगभग 100 करोड़ लगाया गया है जिसमें से लगभग 1000 न्युट्रान तारों को देखा गया है |
न्युट्रान तारों का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग दो गुना तथा त्रिज्या लगभग 10 किमी.होता है | यह अदीप्त होता है तथा सीधे तौर पर नहीं देखा जा सकता है |

कृष्ण छिद्र (Black Hole)

न्युट्रान तारे का भविष्य उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है | अनुमान के अनुसार भारी न्यट्रान तारों का संकुचन अनिश्चित काल तक हो सकता है | इसी क्रम में जब m द्रव्यमान का न्युट्रान तारा संकुचित होकर त्रिज्या r = 2 Gm/c² ( c प्रकाश की चाल , G गुरुत्वाकर्षण नियतांक) प्राप्त कर लेता है तब वह कृष्ण छिद्र (Black Hole) बन जाता है | सर्वप्रथम मिचेल (Michell) ने कृष्ण छिद्र के अस्त्तित्व की कल्पना की थी | कृष्ण छिद्र अपने पृष्ठ से किसी चीज का यहाँ तक की प्रकाश का भी पलायन नहीं होने देता है | इसका कारण यह है की कृष्ण छिद्र (Black Hole) में अत्याधिक आकर्षण बल होता है | प्रकाश के भी पलायन न होने के कारण Black Hole अद्रश्य होते हैं | Black Hole देखे नहीं जा सकते हैं इसकी उपस्थिति को आकाश में उसके पड़ोसी पिण्डो पर उसके प्रभाव द्वारा केवल महसूस किया जा सकता है | हमारे दुग्ध मेखला (Milki Way Galaxy) के केंद्र में एक Black Hole मौजूद है और Milki Way Galaxy में उपस्थित सम्पूर्ण पिंड उस  Black Hole के चारों और चक्कर लगते रहते हैं | 

2 comments:

  1. Very good explanation and very good information. Thanks for sharing. For Solar System facts visit scoopskiller.com

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